Ovis aries orientalis
Ovis aries orientalis
मेमना (पूर्वी मेमना), जिसे वैज्ञानिक नाम Ovis aries orientalis से जाना जाता है, एक अद्वितीय और प्राचीन भेड़ की प्रजाति है जो मध्य एशिया, उत्तरी भारत, अफगानिस्तान, ईरान और तुर्की के पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। यह एक शानदार आकृति वाली, बड़ी टाँगों वाली और घने ऊन वाली भेड़ है जिसके अलग-अलग नामों से जाना जाता है – जैसे अफगान मेमना, इरानी मेमना या गिरिजन मेमना। यह प्रजाति भेड़ के विकास के ऐतिहासिक दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि यह आधुनिक भेड़ों के वंशावली में महत्वपूर्ण अवशेष है। इसकी अद्वितीय आंखों के चारों ओर का गहरा अंधेरा छाया, लंबे घुड़की वाले कान, और विशाल फैली धार वाले खुर इसे ऊंचे पहाड़ी और चट्टानी ढलानों पर चलने में सक्षम बनाते हैं। यह एक सामाजिक प्राणी है जो झुंडों में रहता है और जंगली भेड़ के रूप में अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ता है। आज यह प्रजाति विलुप्त होने के खतरे में है, और इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और स्थानीय समुदायों की अभूतपूर्व प्रयास जारी है।
"Ovis aries orientalis" नाम की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा से आती है, जिसमें "Ovis" का अर्थ है 'भेड़' और "aries" का अर्थ है 'मेमना' या 'बकरी', जो प्राचीन रोमन जीवविज्ञान में इस प्रजाति को निरूपित करने के लिए उपयोग किया गया था। "orientalis" शब्द का अर्थ है 'पूर्वी', जो इस प्रजाति के भौगोलिक उत्पत्ति क्षेत्र को दर्शाता है – विशेष रूप से मध्य एशिया और पूर्वी एशिया के पहाड़ी क्षेत्र। इस नाम का प्रयोग सबसे पहले 18वीं शताब्दी में जार्ज लिन्नेउस द्वारा किया गया था, जिन्होंने इसे भेड़ के एक विशिष्ट उपप्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया।
इस प्रजाति की उत्पत्ति लगभग 10,000 वर्ष पहले के अनुमानित निर्माण के समय में मानी जाती है, जब मानव ने भेड़ के लिए प्राकृतिक चयन के माध्यम से उन्हें पालतू बनाना शुरू किया। विशेष रूप से लेबनान, ईरान और अफगानिस्तान के आसपास के क्षेत्रों में इसका उद्भव हुआ है, जहाँ भेड़ के लिए चराई के अवसर और चट्टानी आवास उपलब्ध थे। यह प्रजाति भेड़ के विकास के दौरान एक प्राचीन अवशेष है और आधुनिक भेड़ों के वंशावली में इसकी जड़ें लगी हैं। इसके विपरीत, आधुनिक भेड़ें अधिकतर नर और मादा दोनों के लिए लंबे ऊन वाली और अधिक उपजाऊ प्रजातियाँ हैं, जबकि पूर्वी मेमना का ऊन घना और कठोर होता है, जो ठंड के लिए बहुत उपयोगी है।
इस प्रजाति का नाम भारतीय भाषाओं में 'मेमना' के रूप में जाना जाता है, जो संस्कृत शब्द "मेमन" से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है 'ऊंची चट्टानों वाला भेड़' या 'पहाड़ी भेड़'। इसके अलावा, इसे अफगानिस्तान में 'शाही मेमना' या 'लाल मेमना' के नाम से भी जाना जाता है, जो इसके शानदार देखने वाले रंग और बड़े धार वाले खुरों को दर्शाता है। इस प्रजाति के नाम में इतिहास, संस्कृति और विज्ञान के तत्व एक साथ मिलते हैं, जो इसे एक अद्वितीय जीव बनाते हैं। आज यह प्रजाति अपने विलुप्त होने के खतरे में है, और इसके नाम की व्युत्पत्ति और उत्पत्ति का अध्ययन उसके संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) एक शानदार और भव्य आकृति वाली भेड़ है जो अपनी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के कारण अन्य भेड़ प्रजातियों से अलग पहचानी जाती है। इसका शरीर लंबा, मजबूत और भारी होता है, जिसकी लंबाई 1.2 से 1.5 मीटर तक हो सकती है और ऊंचाई 80 से 95 सेमी तक होती है। नर भेड़ (बकरे) अधिक बड़े और भारी होते हैं जबकि मादा (भेड़ें) छोटी और हल्की होती हैं। नर भेड़ का वजन 100 से 130 किलोग्राम तक हो सकता है, जबकि मादा का वजन 60 से 80 किलोग्राम तक होता है।
इसकी सबसे विशिष्ट विशेषता उसके बड़े, घुड़की वाले खुर हैं, जो चट्टानी ढलानों और ऊंचे पहाड़ों पर चलने के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। इन खुरों के नीचे एक घना, लचीला टांका होता है जो फिसलन से बचाता है और अच्छा ताकत देता है। इसकी टांगें लंबी और मजबूत होती हैं, जिससे वह ऊंचे ढलानों पर भी आसानी से चल सकती है। इसकी आंखों के चारों ओर एक गहरा काला छाया होती है, जो उसे चमकदार दिखाती है और अंधेरे में बेहतर दृष्टि देती है। इसके कान बड़े और घुड़की वाले होते हैं, जो ध्वनि के प्रति संवेदनशील होते हैं और दुश्मनों के आने का पहले से पता लगाने में मदद करते हैं।
उसके ऊन की विशेषता बहुत घना, लंबा और कठोर होता है, जो ठंडे और ऊंचे जलवायु के लिए बहुत उपयोगी होता है। इसका रंग आमतौर पर भूरे-ग्रे या लाल-भूरे रंग का होता है, जबकि नर भेड़ के ऊन के नीचे एक गहरा बैंगनी या लाल रंग भी हो सकता है। नर भेड़ के सिर पर बड़े, लोटे वाले धार वाले ऊंचे खुर होते हैं, जो लड़ाई में उपयोग किए जाते हैं। ये धार नरों के बीच शक्ति के प्रतीक होते हैं और उन्हें बाहरी खतरों से बचाने में मदद करते हैं। मादा भेड़ों के धार छोटे और कम उभरे होते हैं।
इसकी आंखें बड़ी और गोल होती हैं, जो दूर तक देखने में सक्षम होती हैं, और इसकी नाक तेज और संवेदनशील होती है, जो खाद्य पदार्थों की खोज में मदद करती है। इसकी गर्दन मजबूत और लचीली होती है, जो ऊंचे पहाड़ी आवास में आसानी से चलने में मदद करती है। यह प्रजाति अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण बहुत लचीली और अनुकूलन क्षमता वाली होती है, जो इसे जटिल और खतरनाक पर्वतीय आवास में बचे रहने में सक्षम बनाती है।
Ovis aries orientalis एक जीवविज्ञानिक रूप से बहुत रोचक प्रजाति है जो भेड़ के वंशावली में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसका वैज्ञानिक वर्गीकरण निम्नलिखित है:
यह प्रजाति भेड़ के वंशावली में एक प्राचीन अवशेष मानी जाती है और आधुनिक भेड़ों के विकास के लिए महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसके जीनोम में बहुत सारे विशिष्ट जीन हैं जो इसे ऊंचे ऊंचाई वाले और ठंडे आवास में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। इसके आनुवंशिक लक्षणों में घना ऊन, मजबूत खुर, लंबी टांगें और उच्च ऑक्सीजन उपयोग क्षमता शामिल हैं। इसके जीनोम का अध्ययन वैज्ञानिकों को भेड़ के विकास, अनुकूलन और जैविक विविधता के बारे में गहरी जानकारी देता है।
इस प्रजाति के शरीर में एक विशिष्ट आंतरिक व्यवस्था है जो उच्च ऊंचाई पर जीवित रहने में मदद करती है। इसके रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा अधिक होती है, जो ऑक्सीजन को अधिक कार्यक्षमता से वितरित करता है। इसकी फेफड़ों का आकार बड़ा और दीवारें मजबूत होती हैं, जो ऊंचे ऊंचाई पर भी पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। इसके स्नायुतंत्र में बहुत अधिक संवेदनशीलता होती है, जो इसे ध्वनि, गंध और दृष्टि के माध्यम से खतरों का पता लगाने में सक्षम बनाती है।
इसकी जीवन चक्र लंबा होता है – इसकी औसत जीवन सीमा 12 से 15 वर्ष तक होती है, जबकि कुछ विशेष शर्तों में यह 20 वर्ष तक जीवित रह सकती है। इसकी जीवन शैली अत्यंत सामाजिक होती है, जिसमें झुंडों में रहना और एक नेता के नेतृत्व में चलना शामिल है। इसकी जीवन शैली में एक विशिष्ट व्यवस्था है जहाँ नर भेड़ अपने धार के उपयोग से अपनी स्थिति की रक्षा करते हैं और झुंड में अपने स्थान को बनाए रखते हैं।
इसकी जीवविज्ञान में एक अनोखी विशेषता यह है कि यह भेड़ की वह प्रजाति है जिसके ऊन के बाहरी आवरण में बहुत अधिक कोलेजन और ऊन की रेशों में लचीलापन होता है, जो इसे बर्फ और ठंड में भी बचे रहने में सक्षम बनाता है। इसके अलावा, इसके लार में एक विशिष्ट एंजाइम होता है जो खाद्य पदार्थों के पाचन में मदद करता है, जिससे यह खराब और कठोर खाद्य पदार्थों को भी पचा सकती है। यह एक अत्यंत अनुकूलन क्षमता वाली प्रजाति है जो अपने आवास में बहुत लंबे समय तक जीवित रह सकती है।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) का भौगोलिक वितरण मध्य एशिया और पूर्वी एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित है। इसके प्राकृतिक आवास में अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, अजरबैजान, उत्तरी भारत (जम्मू और कश्मीर के उच्च पहाड़ी क्षेत्र), ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और अफगानिस्तान के उच्च ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। यह प्रजाति आमतौर पर 2,000 से 4,500 मीटर की ऊंचाई पर पाई जाती है, जहाँ वातावरण ठंडा और चट्टानी होता है।
इसका सबसे बड़ा आवास अफगानिस्तान के हिंदूकुश पर्वतमाला में है, जहाँ इसकी अनेक उपप्रजातियाँ पाई जाती हैं, जैसे कि अफगान मेमना (Ovis orientalis vignei) और बलूचिस्तानी मेमना (Ovis orientalis speciosa)। ईरान में इसके आवास क्षेत्र ज़ाग्रोस पर्वतमाला और कोह-ए-बालूच जैसे क्षेत्रों में हैं। भारत में यह प्रजाति जम्मू और कश्मीर के लद्दर, गुरामुली, चिनाब घाटी और नारायणगढ़ क्षेत्रों में पाई जाती है, जो अल्पाइन और मध्य अल्पाइन जलवायु के अंतर्गत आते हैं।
इसके वितरण में एक अनोखी विशेषता यह है कि यह अपने आवास को बहुत सीमित और टुकड़ों में बांटे हुए है, जिसे वैज्ञानिकों ने "क्षेत्रीय विच्छेदन" (fragmentation) कहा है। यह वितरण जलवायु परिवर्तन, मानव आवास, शिकार और चराई के दबाव के कारण बहुत कम हो गया है। आज इसके आवास क्षेत्र बहुत सीमित हो गए हैं, और यह अधिकतर अभयारण्यों और संरक्षण क्षेत्रों में ही पाई जाती है। इसके वितरण को लेकर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह प्रजाति केवल 500 से 1,000 व्यक्तियों के झुंडों में बसी है, जो उसके अस्तित्व के लिए बहुत खतरनाक है।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) का प्राकृतिक आवास अत्यंत विशिष्ट और चुनौतीपूर्ण होता है। यह एक ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में रहता है, जहाँ वातावरण ठंडा, चट्टानी और अक्सर बर्फीला होता है। इसके आवास की ऊंचाई 2,000 से 4,500 मीटर तक होती है, जहाँ वायुमंडलीय दबाव कम होता है और ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है। इस परिस्थिति में जीवित रहने के लिए इसके शरीर में अनेक अनुकूलन हैं, जैसे कि अधिक हीमोग्लोबिन, बड़े फेफड़े और घना ऊन।
इसके आवास में चट्टानी ढलानें, निर्माण वाले पहाड़, घाटियाँ और चट्टानी उपत्यकाएँ होती हैं, जो इसे छिपने और दुश्मनों से बचने में सक्षम बनाती हैं। इसके आवास में घने जंगल नहीं होते, बल्कि लघु घास, झाड़ियाँ, शाखाओं वाले पौधे और बर्फीले झरने होते हैं। इसके आवास में जलवायु चक्र बहुत तीव्र होता है – गर्मी में दिन में तापमान 15–20 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है, जबकि रात में यह -10 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। बर्फ वर्ष भर रहती है, और इसके आवास में बर्फ की मोटाई 1 से 2 मीटर तक हो सकती है।
इसके आवास में अन्य जीव भी पाए जाते हैं, जैसे कि शेर, भालू, बाघ, जंगली बकरी, बाघी और अन्य छोटे जानवर। यह प्रजाति इन जानवरों के साथ एक जटिल पारिस्थितिक तंत्र में शामिल है, जहाँ यह खाद्य श्रृंखला के मध्य में आता है। इसके आवास में पानी के स्रोत बहुत सीमित होते हैं, और इसके लिए बर्फ पिघलने के समय या झरनों से पानी प्राप्त करना आवश्यक होता है। इसके आवास में धूप का बहुत अधिक उपयोग होता है, जिससे बर्फ पिघलती है और खाद्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं।
इस प्रजाति के आवास के लिए मानव गतिविधियाँ बहुत खतरनाक हैं। चराई, शिकार, खनन, राजमार्ग निर्माण और आवास का विस्तार इसके आवास को नष्ट कर रहे हैं। इसके आवास के लिए जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ा खतरा है, क्योंकि गर्मी के कारण बर्फ पिघलने लगती है और जलवायु अस्थिर हो जाती है। इसलिए, इसके आवास के संरक्षण के लिए अभयारण्यों, संरक्षण क्षेत्रों और जलवायु अनुकूलन योजनाओं की आवश्यकता है।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) एक अत्यंत सामाजिक प्राणी है जो अपने जीवन को झुंडों में बिताता है। इसके झुंड आमतौर पर 10 से 50 व्यक्तियों के बीच होते हैं, जिनमें मादा भेड़ें और उनके शावक शामिल होते हैं। नर भेड़ अकेले रहते हैं या छोटे झुंडों में रहते हैं, जिन्हें "बकरे के झुंड" कहा जाता है। यह सामाजिक व्यवहार इसकी जीवन शैली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह खतरों से बचने में मदद करता है।
इसके झुंड में एक नेता होता है, जो आमतौर पर एक बड़ा और अनुभवी नर होता है। यह नेता झुंड को चराई के स्थानों, पानी के स्रोतों और खतरों से बचने के लिए निर्देश देता है। इसके झुंड में संचार बहुत महत्वपूर्ण होता है – इसमें आवाज़, शरीर भाषा और गंध का उपयोग किया जाता है। जब खतरा होता है, तो एक भेड़ चीखती है और झुंड तुरंत भाग जाता है।
इसकी जीवन शैली में एक विशिष्ट अनुकूलन है – यह अपने आवास में अधिकतर दिन के समय चराई करता है और रात के समय आराम करता है। यह एक दिन में 10 से 12 घंटे तक चराई करता है और अपने शरीर को ऊर्जा देने के लिए बहुत अधिक खाद्य पदार्थ खाता है। इसके झुंड में एक नियमित व्यवस्था होती है, जहाँ नेता झुंड को चलाता है और अन्य सदस्य उसका अनुसरण करते हैं।
इसकी सामाजिक व्यवहार में लड़ाई भी होती है, खासकर नर भेड़ों के बीच। इन लड़ाइयों में नर भेड़ अपने धार के उपयोग से एक दूसरे को धक्का देते हैं और अपनी स्थिति की रक्षा करते हैं। यह लड़ाई न केवल शक्ति का प्रदर्शन होती है, बल्कि नेतृत्व के लिए भी होती है। इसके झुंड में एक नेता बनने के लिए इन लड़ाइयों का आयोजन किया जाता है।
इसकी जीवन शैली में एक अनोखी विशेषता यह है कि यह अपने झुंड के साथ बहुत लंबे समय तक रहता है, जबकि नर भेड़ अपने झुंड से बाहर निकलते हैं और अकेले रहते हैं। यह जीवन शैली इसे अपने आवास में बचे रहने में सक्षम बनाती है और इसके जीवन चक्र को सुरक्षित रखती है।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) का प्रजनन चक्र अपने जीवन चक्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका प्रजनन काल आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर तक होता है, जब शीत ऋतु शुरू होती है। इस समय नर भेड़ अपने धार के उपयोग से लड़ाई करते हैं और अपनी स्थिति की रक्षा करते हैं। मादा भेड़ें अपने शावक के लिए तैयार होती हैं और नर भेड़ों के साथ जुड़ती हैं।
प्रजनन के बाद, गर्भावस्था काल 145 से 150 दिन तक होता है। इसके बाद मादा भेड़ एक या दो शावकों को जन्म देती है। शावक जन्म के तुरंत बाद खड़े हो जाते हैं और अपनी माँ के साथ चलने लगते हैं। इनके शरीर पर एक छोटा ऊन होता है, जो बाद में बढ़ता है। शावक को अपनी माँ के दूध से पोषण मिलता है, जो उन्हें तीन से चार महीने तक दिया जाता है।
शावक की देखभाल मादा भेड़ द्वारा की जाती है, जो उन्हें झुंड में रखती है और उन्हें खाद्य पदार्थ और पानी के स्रोत तक ले जाती है। शावक अपने अगले वर्ष तक अपनी माँ के साथ रहते हैं और फिर अलग हो जाते हैं। नर शावक अपने अगले वर्ष तक अलग हो जाते हैं और अकेले या छोटे झुंडों में रहते हैं।
इसका जीवन चक्र लंबा होता है – इसकी औसत जीवन सीमा 12 से 15 वर्ष तक होती है, जबकि कुछ विशेष शर्तों में यह 20 वर्ष तक जीवित रह सकती है। इसके जीवन चक्र में एक अनोखी विशेषता यह है कि यह अपने आवास में बहुत लंबे समय तक जीवित रह सकती है, जबकि अन्य भेड़ प्रजातियाँ जल्दी जीवित रहती हैं।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) एक शाकाहारी प्राणी है जो अपने आहार में विभिन्न प्रकार के पौधों का उपयोग करता है। इसके आहार में घास, झाड़ियाँ, शाखाएँ, पत्तियाँ, फूल और बर्फीले झरनों से उगने वाले पौधे शामिल होते हैं। इसके आहार में अधिकांशतः उच्च ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाने वाले छोटे पौधे होते हैं, जो ठंड में भी जीवित रहते हैं।
इसका भोजन व्यवहार बहुत अनुकूलन क्षमता वाला होता है। यह अपने आहार में बहुत खराब और कठोर पौधों का उपयोग करता है, जो अन्य जानवरों के लिए अप्राप्य होते हैं। इसके लार में एक विशिष्ट एंजाइम होता है जो खाद्य पदार्थों के पाचन में मदद करता है। यह अपने आहार में बहुत अधिक खाद्य पदार्थ खाता है, जिससे इसे ऊर्जा मिलती है।
इसका आहार व्यवहार जलवायु के अनुसार बदलता है। गर्मी में यह अधिक घास और पत्तियाँ खाता है, जबकि ठंड में यह शाखाएँ और झाड़ियाँ खाता है। इसके आहार में पानी की आवश्यकता होती है, और यह बर्फ पिघलने के समय या झरनों से पानी प्राप्त करता है। इसका आहार व्यवहार इसे अपने आवास में बचे रहने में सक्षम बनाता है।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) का आर्थिक और व्यावहारिक महत्व बहुत अधिक है, भले ही यह आधुनिक भेड़ों की तुलना में कम प्रचलित हो। इसके ऊन का उपयोग बहुत अच्छी गुणवत्ता वाले कपड़ों और वस्त्रों के निर्माण में किया जाता है, जो ठंड में बहुत उपयोगी होते हैं। इसके ऊन की विशेषता घना, लंबा और कठोर होता है, जो बर्फ और ठंड में बहुत अच्छा उपयोग करता है।
इसके मांस का उपयोग भी किया जाता है, जो बहुत स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है। इसके धार और हड्डियाँ भी उपयोगी होती हैं – धार का उपयोग आभूषणों और उपकरणों में किया जाता है, जबकि हड्डियाँ कार्बन और खाद के रूप में उपयोग की जाती हैं।
इसका व्यावहारिक महत्व इसके संरक्षण और पारिस्थितिकी में भी है। यह एक महत्वपूर्ण प्रजाति है जो अपने आवास में खाद्य श्रृंखला के मध्य में आती है और अन्य जीवों के लिए आवास और खाद्य स्रोत प्रदान करती है। इसके संरक्षण के लिए अभयारण्यों और संरक्षण क्षेत्रों की आवश्यकता होती है, जो आर्थिक रूप से भी लाभदायक हो सकते हैं।
पूर्वी मेमना (Ovis aries orientalis) अपने पारिस्थितिक तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह एक मध्यवर्ती जीव है जो खाद्य श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह घास, झाड़ियाँ और पौधों को खाता है, जिससे उनका अत्यधिक विकास नहीं होता और अन्य प्राणियों के लिए आवास बनता है। इसके खाद्य श्रृंखला में शेर, भालू, बाघ और अन्य शिकारी जानवर शामिल हैं।
इसके संरक्षण के लिए अनेक उपाय लागू किए जा रहे हैं, जैसे कि अभयारण्यों की स्थापना, शिकार पर प्रतिबंध, चराई के नियमन और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ योजनाएँ। इन उपायों के माध्यम से इसके आवास को सुरक्षित रखा जा रहा है और इसकी आबादी को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
मनुष्यों के साथ पूर्वी मेमना का संपर्क बहुत जटिल है। इसके खतरे में शामिल हैं शिकार, चराई का दबाव, आवास का विस्तार और जलवायु परिवर्तन। इसके लिए मनुष्यों के लिए चुनौतियाँ भी हैं, जैसे कि इसके आवास में रहने वाले लोगों के लिए खाद्य और पानी की कमी।
पूर्वी मेमना का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। यह अफगानिस्तान, ईरान और भारत के लोगों के लिए प्रतीक है और उनके लोक गीतों, कथाओं और लोक धर्म में शामिल है। इसके चित्रण और प्रतीक बहुत लोकप्रिय हैं।
शिकार पर वैधानिक स्थिति बहुत सख्त है। इस प्रजाति के शिकार पर प्रतिबंध है और इसके शिकार के लिए लाइसेंस की आवश्यकता होती है।
पूर्वी मेमना के बारे में रोचक तथ्य यह है कि यह बर्फीले पहाड़ों पर चल सकती है, और इसके खुर बहुत लचीले होते हैं।
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प्रकाशित: 23 марта 18:52

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